Anant chaturdashi katha : अनन्त चतुर्दशी कथा - Gyan.Gurucool
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अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा\(anant chaturdashi katha)

(anant chaturdashi katha)\अनंत चतुर्दशी कथा

भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को अनन्त चतुर्दशी का व्रत किया जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना के बाद अननंत सूत्र बांधे जाते हैं इस व्रत से जुड़ी एक लोककथा है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया।
उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही,

अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी
जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी बहुत सावधानी करने पर भी
बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।

एक बार कहीं से टहलते टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रोपदी ने यह देखकर
‘ अंधों की
संतान अंधी ‘ कहकर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया। 

यह बात उसके ह्रदय में बाण समान लगी उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली।
उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे।
उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूति क्रीड़ा में हराकर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया। 

पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे।
एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा।

इस प्रकार (anant chaturdashi katha ) श्री कृष्ण ने कहा – ‘ हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो,
इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुनः प्राप्त हो जाएगा।’

श्रीकृष्ण ने एक कथा कही\ (shri krishan ne ek katha khi)

(anant chaturdashi katha )सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था।
उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा जयोतिर्मयी कन्या थी।
जिसका नाम सुशीला था सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता की मृत्यु हो गई। 

पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया।
सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिनय ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में
कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटे और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए। 

कौडिन्य ऋषि दुःखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए।
परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे। 

सुशीला ने देखा वहां पर बहुत सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा कर रही थी। 

सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधि पूर्वक अनंत व्रत
( anant chaturdashi katha )की महत्ता बताई।

सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांधकर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई। 

कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात दी। उन्होंने डोरे को तोड़कर अग्नि में डाल दिया,
इससे भगवान अनन्त जी का अपमान हुआ। परिणामत: ऋषि कौडिन्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई ।
इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनन्त भगवान का डोरा जलाने की बात कही|

तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले – ‘हे कौडिन्य ! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा।
तुम दुखी हुए। अब तुमने पश्चाताप किया है मैं तुमसे प्रसन्न हूं अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो।

चौदह वर्ष पर्यन्त व्रत करने से तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा। तुम धन धान्य से सम्पन्न हो जाओगे। कौडिन्य ने
वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।’

(anant chaturdashi katha kyo khi jati hai)\अनंत चतुदशी कथा क्यों कहि जाती है

(anant chaturdashi katha)  श्री कृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनन्त भगवान का व्रत किया जिसके
प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे। 

 

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