दशा माता व्रत कथा | Dasha mata ki katha - Gyan.Gurucool
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दशा माता व्रत कथा(dasha mata)

 

Dasha mata पौराणिक कथा

 

(dasha mata) पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल और दमयंती रानी सुखपूर्वक रहते थे
उनके दो पुत्र थे उनके राज्य में प्रजा सुखी और सम्पन्न थी एक दिन की बात है कि उस दिन होली दशा थी।
एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा -” दशा का डोरा ले लो। 

बीच में दासी बोली – “हां रानी साहिबा, आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं महिलाएं (dasha mata)दशा माता की पूजा और व्रत करती है
तथा इस डोरे की पूजा करके गले में बांधती है जिससे अपने घर में सुख समृद्धि आती है। “

अंत: रानी ने ब्राह्मणी से डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजन करके गले में बांध दिया।
कुछ दिनों के बाद राजा नल ने दमयंती के गले में डोरा बंधा हुआ देखा।
राजा ने पूछा _”  इतने सोने के गहने पहनने के बाद भी अपने यह डोरा क्यों पहना?

” रानी कुछ कहती, इसके पहले ही राजा ने डोरे को तोड़कर जमीन पर फेंक दिया।

रानी ने उस डोरे को जमीन से उठा लिया और राजा से कहा -” यह तो (dasha mata) दशा माता का डोरा था, आपने उनका अपमान करके अच्छा नहीं किया।” 

दशा माता व्रत कथा

जब रात्रि में राजा सो रहे थे, तब (dasha mata) दशा माता स्वप्न में बुढ़िया के रूप में आई और राजा से कहा -” हे राजा! तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है।
तुने मेरा अपमान करके अच्छा नहीं किया। ऐसा कहकर बुढ़िया अन्तर्ध्यान हो गई।

अब जैसे जैसे दिन बीतते गए, वैसे वैसे कुछ दिनों में राजा के ठाठ बाठ, हाथी घोड़े, लाव लश्कर, धन धान्य, सुख शांति सब कुछ नष्ट होने लगा।
अब तो भूखे मरने तक का समय आ गया था। (dasha mata) एक दिन राजा ने दमयंती से कहा -” तुम अपने दोनों बच्चों को लेकर मायके चली जाओ।
” रानी ने कहा -” मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।”

जिस प्रकार आप रहेंगे ठीक वैसे ही मैं भी साथ में रहूंगी।
तब राजा ने कहा -” अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में चले। वहां जो भी काम मिल जाएगा,
वहीं काम कर लेंगे। इस प्रकार नल दमयंती अपने देश को छोड़कर चल दिए।

चलते चलते रास्ते में भील राजा का महल दिखाई दिया।
वहां राजा ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के रूप में छोड़ दिया।
आगे चले तो रास्ते में राजा के मित्र का गांव आया। राजा ने रानी से कहा -” चलो, हमारे मित्र के घर चलें।

मित्र के घर पहुंचने पर उनका खूब आदर सत्कार हुआ और पकवान बनाकर भोजन करवाया गया।
मित्र ने अपने शयनकक्ष में सुलाया। उसी कमरे में मोर की आकृति की खूंटी पर मित्र की पत्नी का हीरों का जड़ा कीमती हार टंगा था।
मध्यकालीन में रानी की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि वह बेजान खूंटी हार को निगल रही है।

दशा माता व्रत कथा

यह देखकर रानी ने तुरंत राजा को जगाकर दिखाया और दोनों ने विचार किया कि सुबह होने पर मित्र के पूछने पर क्या जवाब देंगे?
अतः यहां से इसी समय चले जाना चाहिए। राजा रानी दोनों रात्रि को वहां से चल दिए। 

सुबह होने पर मित्र की पत्नी ने खूंटी पर अपना हार न देखकर अपने पति से कहा -” तुम्हारे मित्र कैसे हैं, जो मेरा हार चुराकर रात्रि में ही भाग गए।”
मित्र ने अपनी पत्नी को समझाया कि मेरा मित्र कदापि ऐसा नहीं कर सकता, धीरज रखो। 

आगे चलकर राजा नल की बहन का गांव आया। राजा ने बहन के घर खबर पहुंचाई की तुम्हारे भाई भौजाई आए हुए हैं।
खबर देने वाले से बहन ने पूछा -” उनके हाल चाल कैसे हैं? ” वह बोला – दोनों अकेले हैं, पैदल ही आए हैं
तथा वे दुखी हाल में है इतनी बात सुनकर बहन थाली में कांदा रोटी रखकर भैया भाभी से मिलने आई।

राजा ने तो अपने हिस्से का खा लिया, परंतु रानी ने जमीन में गाड़ दिया। चलते चलते एक नदी मिली।
राजा ने नदी में से मछलियां निकालकर रानी से कहा -” तुम इन मछलियों को भूंजो, मैं गांव में से परोसा लेकर आता हूं।

गांव का नगर सेठ सभी लोगों को भोजन करा रहा था। राजा गांव में गया और परोसा लेकर वहां से चला तो चील ने झपट्टा मारकर सारा भोजन नीचे गिरा दिया।
राजा ने सोचा कि रानी विचार करेगी कि राजा तो भोजन करके आ गया और मेरे लिए कुछ नहीं लाया।
उधर रानी मछलियां भूंजने लगी तो दुर्भाग्यवश सभी मछलियां जीवित होकर नदी में चली गई।

दशा माता व्रत कथा

रानी उदास हो सोचने लगी कि राजा सोचेंगे कि सारी मछलियां खुद खा गई।
जब राजा आए तो मन ही मन सब समझ गए और वहां से चल दिए। 

चलते चलते रानी के मायके का गांव आया। राजा ने कहा – तुम अपने मायके चली जाओ।
वहां दासी का कोई भी काम कर लेना। मैं इसी गांव में कहीं नौकर हो जाऊंगा।
इस प्रकार रानी महल में दासी का काम करने लगी और राजा तेली के घाने पर काम करने लगा।
दोनों को काम करते हुए बहुत दिन हो गए।

जब होली दशा का दिन आया, तब सभी रानीयो ने सिर धोकर स्नान किया।
दासी ने भी स्नान किया। दासी ने रानियों का सिर गूंथा तो राजमाता ने कहा -” मैं भी तेरा सिर गूंथ दूं।

ऐसा कहकर राजमाता जब दासी का सिर गूंथ ही रही थी, तब उन्होंने दासी के सिर में पद्म देखा।
यह देखकर राजमाता की आंखें भर आईं और उनकी आंखों से आंसू की बूंदें गिरी।
आंसू जब दासी की पीठ पर गिरे तो दासी ने पूछा -” आप क्यों रो रही है?” 

राजमाता ने कहा -” तेरे जैसी मेरी भी एक बेटी है जिसके सिर में भी पद्म था,
तेरे सिर में भी पद्म है। यह देखकर मुझे उसकी याद आ गई।
तब दासी ने कहा -” मैं ही आपकी बेटी हूं।”( dasha mata) दशा माता के कोप से मेरे बुरे दिन चल रहे हैं इसलिए यहां चली आई।
माता ने कहा -” बेटी तुने यह बात हमसे क्यों छिपाई?

dasha mata दासी ने कहा –” मां, मैं सब कुछ बता देती तो मेरे बुरे दिन नहीं कटते।
आज मैं (dasha mata) दशा माता का व्रत करूंगी तथा उनसे गलती की क्षमा याचना करूंगी।

व्रत की महता

अंनत: (dasha mata) दशा माता के आशीर्वाद से राजा नल और दमयंती के अच्छे दिन लौट आए।
दमयंती के पिता ने खूबसारा धन
देकर हाथी घोड़े के साथ बेटी जमाई विदा किए।
जैसी कृपा हम पर की वैसी सब पर करना।