Trayodashi Vrat Katha 2023 : त्रयोदशी या प्रदोष व्रत कथा वर्णन - Gyan.Gurucool
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त्रयोदशी व्रत कथा || Trayodashi Vrat Katha 

Trayodashi Vrat Katha

 

 

(Trayodashi Vrat Katha) भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है
कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से सभी तरह से कष्ट दूर हो जाते हैं सोमवार के दिन यह व्रत करने से संतान की प्राप्ति होती है।
वहीं मंगल के दिन यह व्रत करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है।

 

हमारे शास्त्रों में अनेक ऐसी साधनाएं एवं व्रतों का उल्लेख मिलता है
जिनके करने से साधक व श्रद्धालु अपने निहित उद्देश्यों एवं मनोकामनाओं की पूर्ति कर सकते हैं
पूर्ण श्रद्धा भाव से किया गया व्रत निश्चय ही फलदायी होता है।

 

हिंदू धर्म में कई ऐसे व्रत है जिनके करने से व्यक्ति अपने जीवन में लाभ प्राप्त कर सकता है किन्तु प्रदोष व्रत का सनातन धर्म में अतिमहत्वपूर्ण स्थान है। 

 

Trayodashi Vrat Katha

चंद्रमौलेश्वर भगवान शिव की प्रसन्नता से मिला आशीर्वाद

 

Trayodashi Vrat Katha चंद्रमौलेश्वर भगवान शिव की प्रसन्नता व आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
भगवान शिव को आशुतोष भी कहा जाता है , जिसका आशय है शीघ्र प्रसन्न होकर अशीष देने वाले व्रत को श्रद्धा व भक्तिपूर्वक करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है ।

 

धार्मिक शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जिस तरह एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है
अतः: इस दिन शिवजी की विधिवत पूजा आदि की जाती है।
इसके अलावा इस दिन Trayodashi Vrat Katha त्रयोदशी व्रत यानि प्रदोष व्रत से संबंधित कथा का वाचन अवश्य करना चाहिए।

 

Trayodashi Vrat Katha

Trayodashi Vrat Katha ||  त्रयोदशी  व्रत कथा

 

Trayodashi Vrat Katha पौराणिक कथा के अनुसार एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी उसके पति का स्वर्गवास हो गया था
उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था
इसलिए प्रातः होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी।
भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी। 

 

एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला ब्राह्मणी दयावश उसे घर ले आई।
वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था।

 

शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था
और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा मारा फिर रहा था।
राजकुमार ब्राह्मण पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा। 

त्रयोदशी या प्रदोष व्रत कथा

एक दिन अंशुमती नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई।
अगले दिन अंशुमती अपने माता पिता को राजकुमार से मिलाने लाई।

 

उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमती के माता पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार भा गया।
कुछ दिनों बाद अंशुमती के माता पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया
कि राजकुमार और अंशुमती का विवाह कर दिया जाए उन्होंने वैसा ही किया। 

 

ऐसी मान्यता है कि ब्रह्माणी प्रदोष Trayodashi Vrat Katha व्रत करती थी
उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्व राज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया
और पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर आनन्द पूर्वक रहने लगा।
राजकुमार ने ब्राह्मण पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया।

 

ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के महात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण पुत्र के दिन फिरे,
वैसे ही शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं
अतः सोमप्रदोष का व्रत करने वाले सभी भक्तों को यह कथा अवश्य पढ़नी चाहिए।
उसे भगवान की कृपा प्राप्त होती है। 

 

सभी पंचांगों में इस व्रत की तिथि का विशेष उल्लेख दिया गया होता है।
दिन के अनुसार प्रदोष व्रत के महत्व और भी अधिक वृद्धि हो जाती है।
जैसे सोमवार व्रत, मंगलवार व्रत भौम त्रयोदशी के नाम से जाना जाता है इन दिनों में आने वाला यह व्रत विशेष लाभदायक होता है। 

 

Trayodashi Vrat त्रयोदशी वाले दिन स्नान करने के पश्चात् भगवान शिव का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए
दिन में केवल फलाहार ग्रहण कर Trayodashi Vrat त्रयोदशी में भगवान शिव का अभिषेक पूजन कर व्रत करना चाहिए। 

 

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