तुलसी विवाह कथा (Tulsi vivah vrat katha ) - Gyan.Gurucool
chat-robot

LYRIC

तुलसी शालीग्राम विवाह की प्राचीन कथा (Tulsi vivah vrat katha )

पौराणिक कथा :-

Tulsi vivah vrat katha  तुलसी विवाह व्रत कथा का रहस्य जानने के लिए हम  प्राचीन काल की कथा सुनेगे ।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी शालीग्राम (Tulsi vivah vrat katha) व्रत पौराणिक कथा के अनुसार जालंधर नाम का एक राक्षस देवी – देवताओं को अपने आतंक से तबाह कर रखा था।
कहते हैं कि जालंधर की पत्नी वृंदा एक पतिव्रता नारी थी। कहा जाता है कि उसकी पूजा से से।
जालंधर को किसी युद्ध में पराजय हासिल नहीं होती थी।

जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गए तथा रक्षा की गुहार लगाई।
उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया।
उन्होंने जलंधर का रूप धर कर छल से वृंदा का स्पर्श किया।

वृंदा का पति जलंधर,देवताओं से पराक्रम से युद्ध कर रहा था।
भगवान विष्णु इस बात को जानते थे कि
वृंदा की भक्ति को भंग किए बिना जालंधर को परास्त करना मुमकिन नही है।

ऐसे में उन्होनें जलंधर को युद्ध में मार गिराया। https://artigyan.com/aartis/page/5/ वृंदा को जलंधर की मृत्यु का समाचार मिलने पर वह बहुत निराश हो गई ।
बाद में जब वृंदा को उसके साथ किए गए छल का पता चला तो वह क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप देकर चली गई।

वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग होने की वजह से उसने भगवान श्रीहरि को श्राप दे दिया “जिस तरह आपने छल से मुझे वियोग का कष्ट दिया उसी तरह आपकी पत्नी का भी छल से हरण होगा।”

साथ ही आप पत्थर के हो जाएंगे और उस पत्थर को लोग शालीग्राम के रूप में जानेंगे। ऐसा कहा जाता है कि वृंदा के श्राप की वजह से भगवान विष्णु ने दशरथ के पुत्र श्रीराम के रूप में जन्म लिया।

Tulsi vivah vrat katha

 

तुलसी विवाह कथा

फिर बाद में उन्हें सीता हरण के वियोग का कष्ट उठाना पड़ा।
वृंदा के श्राप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर का बनाया जो शालिग्राम कहलाया।
भगवान विष्णु को दिया श्राप वापस लेने के पश्चात् वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई।

वृंदा की राख से तुलसी का पौधा निकला वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालीग्राम रूप का विवाह तुलसी (Tulsi vivah vrat katha) से करवाया।

भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी।
तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा एवं मैं तुम्हारे बिना भोजन भी ग्रहण नहीं करूंगा।

यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है
तथा बिना तुलसी (Tulsi vivah vrat katha) के प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।

 इसी घटना की याद में प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन (Tulsi vivah vrat katha) तुलसी का विवाह शालीग्राम के साथ कराया जाता है।शालिग्राम का पत्थर गंडकी नदी से प्राप्त किया जाता है ।

 मान्यता है कि जो कोई तुलसी का विवाह (Tulsi vivah vrat katha) शालीग्राम से करवाता है
उसका वैवाहिक जीवन खुशियों से भरा रहता है।

Tulsi vivah vrat katha सामग्री :

इस दिन एक मंडप बनाया जाता है और उस मंड़प को गन्ने से बनाना शुभ माना गया है।
गन्ने के मंडप के नीचे एक चौकी लगाई जाती है
इस चौकी पर भगवान विष्णु के रूप में शालिग्राम को तुलसी के साथ रखा जाता है।

(Tulsi vivah vrat katha) जिसे फूलों से सजाया जाता है इस दिन भगवान विष्णु और मां तुलसी की पूजा के लिए धूप,दीप,माला, फूल माला, वस्त्र, सुहाग की सामग्री, लाल चुनरी, साड़ी, हल्दी, आंवला, बेर, अमरूद, मौसमी फल इत्यादि रखे जाते हैं

Tulsi vivah vrat katha

 

Tulsi vivah vrat katha पूजन विधि:-

तुलसी विवाह में वही लोग शामिल होते हैं जो सवेरे नहाकर निवृत्त होते हैं।
एवं तुलसी व्रत रखना अनिवार्य होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी विवाह करवाने वाले को कन्यादान जैसा ही पुण्य मिलता है।

चौकी के ऊपर पानी का कलश और आम के पत्ते कलश पर रखकर नारियल रखा जाता है एवं अन्य सभी सामग्री रखी जाती है।
तुलसी के गमले की साज सज्जा भी की जाती है।
जिस प्रकार विवाह से पूर्व दुल्हन को सजाया जाता है।

शालिग्राम को लेकर तुलसी की सात बार परिक्रमा की जाती है इस दौरान सभी मंगल गीत गाते हैं।
विवाह सम्पन्न करके फल फूल अर्पित किए जाते हैं
और प्रसाद में खीर पूड़ी का का भोग लगाकर सभी को प्रसाद दिया जाता है।

 

 

Your email address will not be published. Required fields are marked *