Divine Melodies: Krishna Ji ki Aarti (कृष्ण जी की आरती) - Gyan.Gurucool
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भगवान् श्री कृष्ण (Krishna) को हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है, तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया। इन अवतारों में उनके सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण के ही माने जाते हैं।

आज से क़रीब पांच हज़ार साल से पहले भगवान श्री कृष्ण (Krishna)का जन्म हुआ था। फिर भी आज भी लोग उनकी पूजा बहुत ही भक्ति और समर्पण भाव से करते हैं। उनकी सोलह हज़ार रानियाँ थीं और वे राजसी और ऐश्वर्यवाला(वैभवशाली) जीवन जिए थे। फिर भी उन्हें भगवान की तरह पूजा गया।भगवान कृष्ण (Krishna) पूजा के योग्य थे और इसीलिए वह आदरणीय थे। कोई भी किसी को आदर नहीं देता जब तक कि वह पूजा के योग्य नहीं होता। भगवान कृष्ण (Krishna) की पूजा उनकी सच्ची समझ की वजह से की जाती है न कि सिर्फ़ पूजा करने के लिए की जाती है।

 

Krishna

Source – Mehera Shaw

 

कृष्ण जी की आरती

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला,
बजावै
मुरली मधुरबाला ।

 

श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला ।

गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली ।

लतन में ठाढ़े बनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग,
मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा
बसी शिव सीस,
जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू
हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

Krishna Ji ki Aarti

Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki
Gale Mein Baijanti Mala, Bajave Murali Madhur Bala।
Shravan Mein Kundal Jhalakala, Nand Ke Anand Nandlala।
Gagan Sam Ang Kanti Kali, Radhika Chamak Rahi Aali।
Latan Mein Thadhe Banamali;
Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak, Chandra Si Jhalak;
Lalit Chavi Shyama Pyari Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥
Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2
Kanakmay Mor Mukut Bilse, Devata Darsan Ko Tarse।
Gagan So Suman Raasi Barse;
Baje Murchang, Madhur Mridang, Gwaalin Sang;
Atual Rati Gop Kumaari Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥
Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2
Jahaan Te Pragat Bhayi Ganga, Kalush Kali Haarini Shri Ganga।
Smaran Te Hot Moh Bhanga;
Basi Shiv Shish, Jataa Ke Beech, Harei Agh Keech;
Charan Chhavi Shri Banvaari Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥
Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2
Chamakati Ujjawal Tat Renu, Baj Rahi Vrindavan Benu।
Chahu Disi Gopi Gwaal Dhenu;
Hansat Mridu Mand, Chandani Chandra, Katat Bhav Phand;
Ter Sun Deen Bhikhaaree Ki॥
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥
Aarti Kunj Bihari Ki
Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥ x2
Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥
Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Girdhar Krishna Murari Ki॥

वे वासुदेव थे। वासुदेव यानी वे इस दुनिया की सभी चीज़ों का मज़ा लेते हैं, फिर भी वे मोक्ष के अधिकारी है। भगवान कृष्ण (Krishna) असाधारण महामानवीय शक्तियों और उपलब्धियों के मालिक थे। वे इतने शक्तिशाली थे कि हजारों लोग उनकी एक दृष्टि से ही डर जाते थे।

भगवान कृष्ण (Krishna) की सोलह हजार रानियाँ थीं फिर भी वे नेष्टिक ब्रह्मचारी थे। इसका मतलब यह था कि उनका हर पल भाव और समर्पण ब्रह्मचर्य के लिए ही था।

जब कि उनके प्रारब्ध कर्म अब्रह्मचर्य के थे, लेकिन उनके अंदर के भाव शुद्ध और हमेशा ब्रह्मचर्य के समर्थक थे। यह उसी तरह है जैसे कोई व्यक्ति चोरी करता है, लेकिन उसके अंदर के भाव हमेशा ऐसे होते हैं कि ‘मैं चोरी नहीं करना चाहता,’ तब उसे नेष्टिक अचोर्य(अंदर के भाव चोरी नहीं करने के हैं)। अंदर के भाव से ही आने वाले जीवन के नए कर्म बँधते हैं।

दूसरी ओर जब व्यक्ति लोगों को दान देता है तब उसके अंदर ऐसे भाव होते हैं कि ‘मुझे उन लोगों से इसका लाभ मिलेगा’ उसके दान का फल अगले जीवन में नहीं मिलेता।

सभी चीज़ें जो हम अपनी पाँच इंद्रियों से देखते हैं और अनुभव करते हैं उनका हमारे अगले जीवन के कर्म के खाते के लिए कोई महत्व नहीं है। हमारे अंदर के भावों की वजह से ही नए कर्म बँधते हैं। बाहर के कर्मों के साथ ही अंदर के के भाव होते रहते हैं।

kunj bihari aarti - krishna

कृष्ण जी की आरती

 

 

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